28 साल नौसेना में देश की सेवा, अब अपने ही खेतों में संघर्ष! रुद्रप्रयाग के किसान हीरामणि सेमवाल की दर्दभरी कहानी
स्यूण्ड गांव, जिला रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड
उत्तराखंड के पहाड़ों से पलायन रोकने की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई सवाल खड़े करती है। कोई रोजगार की तलाश में गांव छोड़ रहा है, तो कोई गांव में रहकर खेती करने के बावजूद व्यवस्था से निराश हो रहा है। रुद्रप्रयाग जिले के श्यून्ड गांव के निवासी हीरामणि सेमवाल की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। भारतीय नौसेना में चीफ ऑफिसर के पद पर करीब 28 साल तक देश की सेवा करने के बाद वर्ष 1995 में सेवानिवृत्त हुए हीरामणि सेमवाल ने शहरों में बसने के बजाय अपने गांव और खेत-खलिहानों को आबाद करने का फैसला किया। लेकिन आज जंगली जानवरों के बढ़ते आतंक और खेती की लागत के मुकाबले उचित दाम नहीं मिलने से उनका हौसला टूटने लगा है। सवाल यह है कि आखिर पहाड़ का किसान कब तक अपनी मेहनत और अपनी पूंजी को बर्बाद होते देखता रहेगा?
देश की सेवा के बाद गांव की मिट्टी से जुड़ाव
रुद्रप्रयाग जिले के श्यून्ड गांव के रहने वाले हीरामणि सेमवाल ने अपनी जिंदगी के करीब 28 साल भारतीय नौसेना में बिताए। चीफ ऑफिसर के पद पर सेवाएं देने के बाद वर्ष 1995 में सेवानिवृत्त हुए। आमतौर पर सेवानिवृत्ति के बाद लोग शहरों में बसने और आरामदायक जिंदगी बिताने का रास्ता चुनते हैं, लेकिन हीरामणि सेमवाल ने अपने गांव की मिट्टी को चुना। उन्होंने गांव में खेती-किसानी को दोबारा मजबूत करने का संकल्प लिया। बैलों की जोड़ी से खेतों में काम शुरू कराया और पारंपरिक खेती के साथ-साथ फल, सब्जियों और फूलों के उत्पादन की दिशा में भी कदम बढ़ाए।
26 एकड़ जमीन पर खेती का अनूठा प्रयास
श्यून्ड गांव में हीरामणि सेमवाल करीब 26 एकड़ जमीन पर खेती-किसानी से जुड़े हैं। गांव की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार कहीं सिंचाई की सुविधा है, तो कहीं पूरी तरह बारिश पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके बावजूद उन्होंने धान, गेहूं, मक्का, मंडुवा और झंगोरा जैसी पारंपरिक फसलों के साथ खेती में विविधता लाने का प्रयास किया। उनकी खेती सिर्फ अनाज तक सीमित नहीं रही। पपीता, अमरूद, आम, लीची, अखरोट, केला, स्ट्रॉबेरी, माल्टा, नारंगी, अंगूर, आंवला और पहाड़ी गलगल जैसे फलदार पौधों को भी उन्होंने अपने खेतों में जगह दी।
सब्जियों में पहाड़ी आलू, अदरक, हल्दी, धनिया, मेथी, कसूरी मेथी, टमाटर, मूली, प्याज, लहसुन, पत्तागोभी, फूलगोभी, भिंडी, फ्रेंच बीन्स, बैंगन, पहाड़ी छेमी, लौकी, कद्दू, पहाड़ी ककड़ी, खीरा और कड़ुवा करेला जैसी फसलों का उत्पादन करने का प्रयास किया। वहीं गेंदे, गुलाब, डहेलिया और चमेली जैसे फूलों की खेती से फ्लोरीकल्चर को भी बढ़ावा दिया।
जंगल से घिरे गांव में जंगली जानवर बड़ी चुनौती
लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी हीरामणि सेमवाल की सबसे बड़ी परेशानी जंगली जानवर हैं। जंगलों से घिरे इस गांव में जंगली जानवर खेतों में घुसकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। फलदार पेड़ों और नए लगाए गए पौधों को भी नुकसान झेलना पड़ता है। उनका कहना है कि जब किसान महीनों मेहनत करके फसल तैयार करता है और उसे जंगली जानवर नष्ट कर देते हैं, तो उसकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाता है।
यह परेशानी केवल श्यून्ड गांव तक सीमित नहीं है। उत्तराखंड के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में किसान बंदरों, लंगूरों और दूसरे जंगली जानवरों से अपनी फसलों की सुरक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। खेतों की रखवाली में समय और मेहनत खर्च होती है, लेकिन नुकसान होने पर किसान की भरपाई कौन करेगा, यह बड़ा सवाल बना हुआ है।
: महंगे बीज, खाद और मेहनत के बाद भी उचित दाम नहीं
खेती की दूसरी बड़ी चुनौती लागत और बाजार मूल्य के बीच का अंतर है। किसान को बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और पशुपालन पर खर्च करना पड़ता है। गोबर की खाद तैयार करने से लेकर पशुओं के लिए चारा जुटाने तक, खेती के साथ कई जिम्मेदारियां जुड़ी होती हैं।
हीरामणि सेमवाल के मुताबिक, जब किसान महंगे दाम पर लहसुन, प्याज और अदरक के बीज खरीदकर फसल तैयार करता है, तो बाजार में कई बार उसे अपेक्षित कीमत नहीं मिलती। अदरक, लहसुन और अन्य कृषि उत्पादों की बिक्री से होने वाली कमाई अगर लागत तक नहीं पहुंचती, तो किसान के सामने अगली फसल लगाने का संकट खड़ा हो जाता है।
किसान की परेशानी केवल उत्पादन बढ़ाने से दूर नहीं होगी। उसे फसल की सुरक्षा, बेहतर बाजार, उचित मूल्य और जरूरत के समय सरकारी सहायता भी चाहिए।
80 से 90 परिवारों वाले गांव के सामने बड़ा सवाल
श्यून्ड गांव एक ग्राम सभा है, जहां करीब 80 से 90 परिवार रहते हैं। गांव में खेती के लिए जमीन है और उत्पादन की संभावनाएं भी हैं। हीरामणि सेमवाल जैसे लोग यह दिखाते हैं कि अगर पहाड़ में खेती को बेहतर सुविधाएं मिलें, तो स्थानीय स्तर पर रोजगार और उत्पादन के अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
लेकिन जब फसल को जंगली जानवरों से बचाना मुश्किल हो, सिंचाई और बाजार की चुनौतियां बनी रहें और मेहनत के अनुरूप आमदनी न हो, तो खेती के प्रति उत्साह कमजोर पड़ना स्वाभाविक है। ऐसे में पलायन रोकने की कोशिशों के साथ गांव में रहकर खेती करने वाले किसानों की समस्याओं का समाधान भी जरूरी है।
हीरामणि सेमवाल, सेवानिवृत्त चीफ ऑफिसर, भारतीय नौसेना
“मैंने भारतीय नौसेना में करीब 28 साल तक देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के बाद मैंने अपने गांव में रहकर खेती करने और खेत-खलिहानों को आबाद करने का फैसला किया। लेकिन जंगली जानवर फसलें बर्बाद कर देते हैं और बाजार में भी मेहनत के अनुसार दाम नहीं मिलता। ऐसी परिस्थितियों में खेती करना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। सरकार को किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझकर जमीन पर समाधान करना चाहिए।”
हीरामणि सेमवाल की कहानी सिर्फ एक किसान की परेशानी नहीं, बल्कि पहाड़ में खेती के भविष्य से जुड़ा सवाल है। एक ऐसा व्यक्ति, जिसने करीब तीन दशक तक देश की सेवा की और सेवानिवृत्ति के बाद अपने गांव को समृद्ध बनाने का सपना देखा, आज अपनी फसलों को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
जरूरत है कि जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा, नुकसान का उचित मुआवजा, सिंचाई सुविधाओं का विस्तार, कृषि उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
क्योंकि पहाड़ में खेती बचेगी, तभी खेत बचेंगे; खेत बचेंगे, तभी गांव आबाद रहेंगे और गांव आबाद रहेंगे, तभी पलायन रोकने का सपना जमीन पर उतर सकेगा।
ब्यूरो रिपोर्ट: रुद्रप्रयाग, उत्तराखंड
